भगवान श्री कृष्ण की जन्म स्थली होने के कारण मथुरा प्रागैतिहासिक काल से विश्वास और आस्था का केंद्र रहा है | भारत के अति प्राचीन और पुरातन धर्म ग्रंथों में मथुरा का उल्लेख मिलता है | यही वह स्थान है जहां युगपुरुष श्री कृष्ण का जन्म हुआ और उनका बचपन बचपन यही बीता था | श्री कृष्ण ने अपने कर्म योग की शिक्षा से अध्यात्म को नई दिशा दी , मथुरा जिला यमुना नदी के किनारे स्थित है। यह आगरा मंडल का एक हिस्सा है और मथुरा शहर जिला मुख्यालय है। यह आगरा के उत्तर में लगभग 55 किलोमीटर , और दिल्ली के दक्षिण-पूर्व में 145 किलोमीटर स्थित है; वृंदावन शहर से लगभग 11 किलोमीटर और गोवर्धन से 22 किलोमीटर है । मथुरा जिला हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है और इसे भगवान कृष्ण का गृह नगर माना जाता है।

मथुरा के मंदिरों में भगवान को 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाने की परंपरा है, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है। इसमें आमतौर पर 16 प्रकार के नमकीन व्यंजन, 20 प्रकार की मिठाइयां और 20 प्रकार के सूखे मेवे व फल शामिल होते हैं। छप्पन भोग में माखन मिश्री, खीर, रसगुल्ला, जलेबी, कलाकंद, बालूशाही, मेवा बाटी, मंशूर, मेवा पाक, जीरा लड्डू, मठरी, मुरब्बा, साग, दही-चावल, कढ़ी, घेवर, पापड़, मूंग दाल का हलवा, लौकी की सब्जी, पूरी, बादाम का दूध, टिक्की, काजू, बादाम, पिस्ता, इलायची और धनिया पंजीरी जैसे विभिन्न व्यंजन व सामग्री भगवान को प्रसाद के रूप में अर्पित की जाती हैं।

कहा जाता है कि माता यशोदा प्रतिदिन दही मथकर मक्खन तैयार करती थीं और उसमें मिश्री मिलाकर बाल कृष्ण को परोसती थीं। माखन मिश्री भगवान कृष्ण के प्रिय खाद्य पदार्थों में से एक मानी जाती है। ब्रज क्षेत्र में दूध की प्रचुरता और भगवान कृष्ण के प्रिय भोग से जुड़े होने के कारण माखन मिश्री यहां बेहद लोकप्रिय है। लोग इसे भगवान को प्रसाद के रूप में अर्पित करने के साथ-साथ अपने घर भी ले जाते हैं।

मथुरा की छाता तहसील के तरौली गांव की तरौली की रबड़ी दूध की मलाई की परतों, इलायची, केसर और चीनी से तैयार की जाती है। अपने पौराणिक महत्व, लोकप्रियता और स्वाद के कारण यह रबड़ी पर्यटकों के बीच खास तौर पर पसंद की जाती है। पर्यटक इसे भगवान को प्रसाद के रूप में अर्पित करने के साथ-साथ अपने घर भी ले जाते हैं।

मान्यताओं के अनुसार, माता यशोदा ने एक बार दूध को धीमी आंच पर पकने के लिए रखा था, जिससे दूध गाढ़ा हो गया। इसके बाद उन्होंने इसमें चीनी मिलाकर पेड़ा तैयार किया, जिसे बाल गोपाल (भगवान कृष्ण) बेहद पसंद करते थे। तभी से पेड़े को भगवान कृष्ण को पारंपरिक रूप से प्रसाद के रूप में अर्पित किए जाने की मान्यता है।