ललितपुर ज़िला पहले चंदेरी रियासत का हिस्सा था, जिसकी स्थापना 17वीं सदी में एक बुंदेला राजपूत ने की थी; वह ओरछा के रुद्र प्रताप के वंशज थे। 18वीं सदी में, चंदेरी, बुंदेलखंड के ज़्यादातर हिस्सों के साथ, मराठों के अधीन आ गया। 1811 में, पड़ोसी ग्वालियर के दौलत राव सिंधिया ने चंदेरी रियासत को अपने राज्य में मिला लिया। चंदेरी की पुरानी रियासत 1844 में अंग्रेज़ों को सौंप दी गई, और ब्रिटिश भारत का चंदेरी ज़िला बनाया गया, जिसका प्रशासनिक केंद्र ललितपुर था। 1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान यह ज़िला अंग्रेज़ों के हाथ से निकल गया, और 1858 के आखिर तक इसे दोबारा हासिल नहीं किया जा सका। बेतवा नदी के पश्चिम में स्थित ज़िला, जिसमें चंदेरी भी शामिल था, 1861 में ग्वालियर को वापस कर दिया गया, और बाकी बचे ज़िले का नाम बदलकर ललितपुर ज़िला रख दिया गया। 1891 से 1974 तक, ललितपुर ज़िला, झाँसी ज़िले का ही एक हिस्सा था।

बुंदेलखंड क्षेत्र के ललितपुर जनपद की बाजरे की रोटी अपनी सादगी, पौष्टिकता और पारंपरिक स्वाद के लिए विशेष पहचान रखती है। बाजरे के आटे से तैयार की जाने वाली यह ग्लूटेन-मुक्त रोटी फाइबर, आयरन और प्रोटीन से भरपूर होती है तथा ग्रामीण खान-पान संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है। घी या सफेद मक्खन के साथ परोसी जाने वाली यह पारंपरिक रोटी स्वास्थ्य और स्वाद का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है। एक जनपद–एक व्यंजन (ODOC) पहल के अंतर्गत ललितपुर की बाजरे की रोटी को व्यापक पहचान प्रदान करने तथा इससे जुड़े स्थानीय उद्यमियों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से ब्रांडिंग, पैकेजिंग एवं विपणन को प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

ललितपुर का पारंपरिक दूध का हलवा दूध, चीनी और सूखे मेवों से तैयार किया जाता है और अपने स्वाद व गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है। इसकी शुद्धता, पारंपरिक बनाने की विधि और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा इसे खास पहचान देती है। यह न केवल जिले की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार का भी एक महत्वपूर्ण साधन है। इस उद्योग से जुड़ी 100 से अधिक इकाइयों में 1,000 से अधिक लोग कार्यरत हैं।