मुगल और ब्रिटिश काल के दौरान, कासगंज, जो ब्रज के ऐतिहासिक जिले में स्थित है, को 'खासगंज' के नाम से भी जाना जाता था। कासगंज को कभी एक ऊँची जगह पर स्थित बताया गया था, जिसका जल निकास काली नदी (काली धारा) में होता था, जो शहर से लगभग एक मील दक्षिण-पूर्व में बहती है। इस शहर को 1868 में एक नगरपालिका बनाया गया था। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भारत-गंगा के मैदान के केंद्र में स्थित कासगंज ने महाभारत काल से ही प्राचीन राज्यों के सैन्य और राजनीतिक उतार-चढ़ावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह हर्षवर्धन के विशाल साम्राज्य का हिस्सा था, और इसका उल्लेख 7वीं शताब्दी के चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) के वृत्तांतों में मिलता है, जो 647 ईस्वी में इस क्षेत्र से होकर गुज़रे थे। कासगंज शहर के पास अतरंजीखेड़ा नामक एक गाँव है, जहाँ भगवान गौतम बुद्ध ने कभी अपना वर्षावास बिताया था; बौद्धों के लिए यह एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। 1962 में शुरू हुई खुदाई के अनुसार, यह स्थल 1200 ईसा पूर्व से लेकर 300 ईसा पूर्व तक आबाद रहा था। अतरंजीखेड़ा-अचलपुर में प्राचीन बस्तियों से संबंधित अनेक पुरावशेष और खंडहरनुमा संरचनाएँ मौजूद हैं। खुदाई का एक अन्य प्रमुख प्राचीन स्थल जखेड़ा है, जो कासगंज के निकट स्थित एक गाँव है। जखेड़ा में हँसिया, कुदाल, हल के फाल जैसे लोहे के औजार और टेराकोटा (पकी हुई मिट्टी) की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं; ये अवशेष 1000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व के कालखंड से संबंधित हैं। इन खोजों से यह सिद्ध होता है कि जखेड़ा प्राचीन भारत की 'पेंटेड ग्रे वेयर' (चित्रित धूसर मृद्भांड) और 'नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर' (उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांड) संस्कृतियों का एक अभिन्न अंग था।

मूंग दाल, ताज़ी मौसमी सब्जियों और देसी तड़के से तैयार किया जाने वाला यह पारंपरिक व्यंजन कासगंज की स्थानीय खानपान संस्कृति की खास पहचान माना जाता है। इसकी सादगी, पौष्टिकता और हल्का स्वाद इसे हर उम्र के लोगों की पसंद बनाता है। देसी घी, जीरा और हींग का तड़का इसकी खुशबू और स्वाद को और भी खास बना देता है। चावल के साथ परोसा जाने वाला मूंग का दलमा न सिर्फ स्वादिष्ट होता है, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है। ‘एक जनपद–एक व्यंजन’ (ODOC) के तहत कासगंज के इस पारंपरिक व्यंजन को “लोकल से ग्लोबल” तक नई पहचान दिलाने हेतु प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि स्थानीय स्वाद और संस्कृति को व्यापक मंच मिल सके।

कासगंज का कलाकंद सोरों शूकरक्षेत्र, बिलराम, सहावर और कासगंज शहर की पुरानी मिठाई की दुकानों में खास तौर पर प्रसिद्ध है। ताजे दूध और खोये से तैयार की जाने वाली यह मिठाई अपनी दानेदार बनावट, हल्की मिठास और स्वाद के लिए जानी जाती है।

कासगंज की सोन पापड़ी सोरों, पटियाली, अमांपुर और कासगंज शहर में खास तौर पर लोकप्रिय है। बेसन, चीनी और घी से तैयार की जाने वाली यह मिठाई अपनी बारीक, रेशेदार परतों और हल्के स्वाद के लिए जानी जाती है। त्योहारों के दौरान इसे उपहार के रूप में भी खूब दिया जाता है।

सोरों की मोठ चाट स्थानीय बाजारों, तीर्थ क्षेत्रों और घाटों के आसपास खास तौर पर लोकप्रिय है। अंकुरित मोठ की दाल, उबले हुए आलू, हरी चटनी, मसालों और नींबू से तैयार की जाने वाली यह चाट अपने चटपटे, खट्टे और स्वादिष्ट स्वाद के लिए जानी जाती है।