हमीरपुर उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र का एक प्रमुख जिला है, जो यमुना और बेतवा नदियों के संगम के लिए प्रसिद्ध है। यह एक महत्वपूर्ण कृषि केंद्र है, जहां विशेष रूप से तिलहन और दलहन का उत्पादन किया जाता है। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत से समृद्ध हमीरपुर क्षेत्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वन डिस्ट्रिक्ट वन कुज़ीन कार्यक्रम के तहत हमीरपुर जिले के लिए दालमड़े, दुबरी फरा, महुआ बर्फी और सन्नाटा का चयन किया गया है।

हमीरपुर जिले का मढ़े, जिसे खास तौर पर मढ़े के आलू के नाम से जाना जाता है, बुंदेली खान-पान का एक लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन है। अपने अनोखे स्वाद और चटपटेपन के लिए प्रसिद्ध इस व्यंजन में मुख्य रूप से उबले हुए आलू, मट्ठा या दही, बेसन, हरी मिर्च, अदरक, हींग, राई या जीरा और मेथी दाने का इस्तेमाल किया जाता है। बुंदेलखंड और हमीरपुर में शादी-ब्याह, शुभ अवसरों, त्योहारों जैसे गोवर्धन पूजा और अन्नकूट तथा सामूहिक भोज के दौरान मढ़े के आलू तैयार करने की परंपरा रही है।

दाल मुरे उत्तर प्रदेश के हमीरपुर क्षेत्र में लोकप्रिय एक हल्का और कुरकुरा पारंपरिक नाश्ता है। इसे फूले हुए मुरमुरे, भुनी या हल्की तली हुई चना दाल को मिलाकर तैयार किया जाता है। इसमें स्थानीय सूखे मसालों और नमक का मिश्रण डाला जाता है, जो इसे स्वादिष्ट और चटपटा स्वाद प्रदान करता है। मुरमुरे की हल्की बनावट और दाल के कुरकुरेपन का मेल इसे एक स्वादिष्ट और लोकप्रिय स्ट्रीट फूड नाश्ता बनाता है।

हमीरपुर की महुआ बर्फी अपनी भीनी खुशबू, देसी स्वाद और पारंपरिक मिठास के लिए विशेष पहचान रखती है। सूखे महुआ के फूल, मावा, देसी घी और मेवों से तैयार यह मिठाई स्थानीय खानपान और पारंपरिक कला की समृद्ध विरासत को दर्शाती है। महुआ के फूलों को साफ कर भिगोने के बाद पीसकर देसी घी में धीमी आँच पर पकाया जाता है। फिर इसमें मावा, मेवे एवं अन्य सामग्री मिलाकर इसे विशेष आकार दिया जाता है। महुआ में प्राकृतिक मिठास और पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिससे यह मिठाई स्वाद के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक भी मानी जाती है। एक जनपद एक व्यंजन (ODOC) पहल के अंतर्गत इस पारंपरिक उत्पाद की बेहतर ब्रांडिंग, आधुनिक पैकेजिंग एवं व्यापक बाजारों तक पहुँच सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि इसे “लोकल से ग्लोबल” पहचान मिल सके।

दही और मसालों से तैयार किया जाने वाला सन्नाटा हमीरपुर का बेहद लोकप्रिय छाछ का एक प्रकार है। माना जाता है कि इसका तीखा स्वाद कुछ क्षणों के लिए इसे पीने वाले व्यक्ति को बिल्कुल शांत कर देता है, जिसके कारण इसका नाम “सन्नाटा” पड़ा, जिसका अर्थ है “खामोशी”। इसे पारंपरिक रूप से अपच जैसी पाचन संबंधी समस्याओं के लिए भी लाभकारी माना जाता है। राठ, सरीला और मौदहा में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है।

सूखे महुआ फलों से खीर के रूप में तैयार किया जाने वाला दुबरी फरा प्राचीन काल से ही हमीरपुर से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इसका संबंध मौर्य और शुंग राजवंशों के समय से भी रहा है। दुबरी यानी महुआ की खीर में कैल्शियम, आयरन और विटामिन पाए जाते हैं और इसे पारंपरिक रूप से स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। इसे गेहूं के आटे से तैयार किए गए फरे के साथ खाया जाता है।