भारत का धातु शिल्प सोने, चांदी, पीतल, तांबे से तैयार उत्कृष्ट डिज़ाइन और मूर्तियों, गहनों और उपयोगी वस्तुओं को आकार देने में शिल्प कौशल और कला प्रदर्शित करता है। एटा के पीतल के धातु से तैयार बर्तन विशेष रूप से घुंघरू और घंटियां, मेटलवेयर की श्रेणी में आने वाले अलग-अलग तरह के हस्तशिल्प के अंतर्गत आती हैं। भारत विश्व में पीतल के उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक है। परंपरागत घुँघरू की जगह अब सामान्य तौर पर पायल ने ले ली है। भारी घुँघरू की जगह पतली सी पायल का उपयोग होने लगा है। भारतीय पारंपरिक नृत्य शैली की बात करें तो ये दृश्य सौंदर्यशास्त्र, ध्वनि और सही शारीरिक तालमेल पर आधारित है। इसलिए इसमें पहने जाने वाले कपड़ों का भी विशेष ख्याल रखा जाता है। कथक में, घुंघरू को आमतौर पर लहंगा चोली और अनारकली सलवार कमीज के साथ पहना जाता है, जबकि भरतनाट्यम में, उन्हें साड़ी के साथ पहना जाता है।

एटा उच्च गुणवत्ता वाली चिकोरी की खेती और प्रसंस्करण के लिए जाना जाता है। फसल की कटाई के बाद चिकोरी की जड़ों को साफ करके सुखाया, भुना और फिर पाउडर या दानों के रूप में तैयार किया जाता है। अपने मिट्टी जैसे स्वाद के लिए जानी जाने वाली चिकोरी का उपयोग कॉफी के विकल्प के रूप में और विभिन्न खाद्य एवं पेय पदार्थों में एक सामग्री के तौर पर किया जाता है। चिकोरी एटा की कृषि और औद्योगिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।

एटा का प्रसिद्ध घेवर अपनी जालीदार बनावट, समृद्ध स्वाद और पारंपरिक निर्माण कला के लिए जाना जाता है। मैदा, घी, चीनी और दूध से तैयार होने वाला यह विशेष मिष्ठान सही घोल, उचित तापमान और हलवाई की अद्भुत कारीगरी का परिणाम है। गर्म घी में विशेष तकनीक से घोल को परत-दर-परत डालकर इसकी विशिष्ट जालीदार संरचना बनाई जाती है। फिर इसे चाशनी में डुबोकर और सूखे मेवों से सजाकर एक स्वादिष्ट मिठाई का रूप दिया जाता है। ODOC कार्यक्रम के माध्यम से एटा के स्थानीय हलवाइयों और मिठाई व्यवसायों को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग का सहयोग प्रदान किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे इस पारंपरिक मिठाई को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक नई पहचान मिल सके। आइए, एटा के घेवर की अनूठी मिठास का स्वाद लें और स्थानीय उद्यमियों को सशक्त बनाने में सहभागी बनें।

पूरी एटा का एक बेहद लोकप्रिय पारंपरिक व्यंजन है। इसे घरों में तैयार करने के साथ-साथ व्यावसायिक स्तर पर भी बड़े पैमाने पर बनाया जाता है। इस उद्योग से जुड़ी 250 से अधिक इकाइयों में 500 से अधिक लोग कार्यरत हैं।